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अष्टविनायक का पांचवा स्वरुप श्री चिंतामणि विनायक (shree chintamani vinayak) दर्शन

अष्टविनायक दर्शन में अब बात करते ते है अष्टविनायक के दूसरे नबर के स्वरुप श्री चिंतामणि थुर का,जो महारष्ट्र के  जिला पुणे के हवेली तलूका के थुर गांव में आया हुआ है,
shree chintamani vinayak

अष्टविनायक का पांचवा  स्वरुप श्री चिंतामणि विनायक
यह एक पौराणिक एवं  भव्य मंदिर है और मंदिर परिसर में एक बड़ी घंटी है,मान्यतानुसार  मंदिर में मूर्ति स्वयंभू है, जिसमें बाईं सूंड विराजमान है और पूर्व की ओर है।
श्री चिंतामणि विनायक की दोनों आँखों में लाल मोती और हीरे हैं, यह मंदिर आज भी मजबूत स्थिति में है। गणपति मंदिर धरणीधर महाराज देव द्वारा बनाया गया है,
100 वर्षों के बाद  पेशवाओं ने वहां भव्य मंदिर और हॉल बनवाए, यह मंदिर पूरी तरह से लकड़ी से बना है, उस समय इस मंदिर को बनाने में 40,000 रुपये का खर्च आया था, पेशवाओं को यूरोपीय लोगों से पीतल की दो बड़ी घंटियाँ मिली थीं। उनमें से एक महाड में है और दूसरा यहाँ श्री चिंतामणि विनायक मंदिर में है।

27 वर्ष की आयु में माधवराव पेशवा ने तपेदिक का अनुबंध किया फिर उन्हें यहां लाया गया, उन्होंने इस गणपति के सामने अपना जीवन खो दिया, उतना ही नहीं  उनकी पत्नी रमाबाई तब सती हो गईं। उनकी याद में यहां एक गार्डन भी बनाया गया है।
लोक वयका है की भगवान ब्रह्मा ने अपने मन को स्थिर करने के लिए इस स्थान पर गणपति की पूजा की थी,इसी कारण इस गांव को थुर नाम मिला।
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लोगो का यह भी कहना  है  राजा अभिजीत और रानी गुणावती के पुत्र, गुना ने कपिलमुनि से चिंतामणि चुरा लिया। जब कपिलमुनि को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने गणपति से रत्ना गुना से वापस लाने का अनुरोध किया। गणपति ने गुना को मार डाला और रत्न कपिलमुनि को दिया। हालांकि, कपिल मुनि ने इस रत्न को गणपति को अर्पित कर दिया। उन्होंने इसे गणपति के गले में डाल दिया और उनकी चिंता गायब हो गई। इसलिए, गणपति को चिंतामणि के रूप में जाना जाने लगा।

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