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नवदुर्गा श्लोक -माँ शैलपुत्री का मंत्र एवं कथा

 कल से 2020 नवरात्री की शुभ शरुआत हो रही है, नौ रात्रि (नवरात्री) यानी नौ दिन माँ दुर्गा की आराधना करने का अवसर,जिसे उत्सव के रूप में मनाया जाता है, हर हिन्दू हर भक्त को माँ नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की पूरी जानकारी भी होनी चाहिए,नवदुर्गा को पाप विनाशिनी और शक्ति भी कहा जाता है,शुरुआत करते नवदुर्गा है नवदुर्गा के प्रथम स्वरुप "माँ शैलपुत्री " से ....  

maa shailputri 
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नवदुर्गा कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक 

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।                                                                                                            तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।                                                                                              पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।                                                                                                        सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।                                                                                                    नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।                                                                                          उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।। 

नवदुर्गा के पहले स्वरूप "माँ  शैलपुत्री" का मंत्र 

वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।                                                                                                वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ 

ग्रंथ पुराणों के अनुसार "माँ शैलपुत्री" के बारे में जानकारी 

"माँ शैलपुत्री" का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ इसीलिए उनका  नाम 'शैलपुत्री' रख्खा गया था, नवरात्र में प्रथम दिन "माँ शैलपुत्री" की आराधना का दिन, "माँ शैलपुत्री" का वाहन वृषभ है इसीलिए इन्हे वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं,और तो और सती, पार्वती,हेमवती और भवानी नाम भी नाम भी दिए गए है,

सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एकबार यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, मगर अपनी ही पुत्री सती माता जिन्हे पार्वति माता भी कहा जाता है  उन्हें आमंत्रित नहीं करा,यहाँ तक की दामाद भगवान् शंकर जी को भी आमंत्रित करा, क्यूंकि  बेटी सती ने उनकी मर्जी विरुद्ध भगवान शंकर से शादी करी थी, 

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आमंत्रण न मिलने के बावजूद "माँ सती"अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए तैयार हुए, शंकरजी ने कहा कि उन्हें आमंत्रण नहीं इसीलिए वहा जाना उचित नहीं, परन्तु "माँ सती" जिद करते है भगवान शंकर नहीं जाते मगर माता को जाने अनुमति देते है,

"माँ सती" यज्ञ स्थल पर पहुँचते है,मगर पिता  दक्ष ने सबके सामने अपमानजनक वचन कहे,"माँ सती"अपने पति का अपमान सह न सकीं और योगाग्नि से अपने आप को जलाकर भस्म कर लिया,

सारी बात भगवान् शंकर को पता चली  में तांडव करते हुये उस यज्ञ का नाश करवाया, "माँ सती"ने दूसरा जन्म भी शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में लिया और शैलपुत्री कहलाये, शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। 

माता  शैलपुत्री  मंदिर 

मां शैलपुत्री का मंदिर उत्तरप्रदेश काशी में स्थान मढिया घाट बताया गया है जो वर्तमान में अलईपुर क्षेत्र में है.ये एक प्राचीन मंदिर है और मान्यताओं के मुताबिक यही मां शैलपुत्री का पहला मंदिर है. नवरात्री के प्रथम दिन यहाँ लाखो भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण करने माता का आशीर्वाद प्राप्त करने आते है 



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