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श्रीमंत कमांडर इन चीफ उमाबाई साहब दाभाडे को श्रध्धांजलि

मराठा  इतिहास में, उमाबाई दाभाडे को मुख्य रूप से एक सक्षम और संघर्षशील महिला के रूप में उल्लेख किया गया है, मराठा दाभाडे कबीले के एक प्रमुख सदस्य थे,श्रीमंत कमांडर-इन-चीफ उमाबाई साहब दाभाडे को उनकी 28 नवम्बर  पुण्यतिथि के अवसर पर भावभीनी श्रद्धांजलि,यह इतिहास हमें क्यों नहीं पढ़ाया ?
श्रीमंत कमांडर इन चीफ उमाबाई साहब दाभाडे

दाभाड़े परिवार शिवाजी महाराज के समय से मराठा सेना से जुडा हुआ था, जब बाजीराव पेशवा महाराष्ट्र के बाहर मराठा साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार करने वाले पहले व्यक्ति थे, तब खंडेराव दाभाड़े गुजरात की ओर बढ़ रहे थे, 

1731 में दाभोई की लड़ाई में खंडेराव दाभाड़े की मृत्यु हो गई, अपने पति के निधन के दु: ख के बावजूद, उमाबाई  ने विरासत की जिम्मेदारी संभाली क्योंकि उनके बच्चे छोटे थे, उन्होंने न केवल कार्यालय का काम देखा, बल्कि सेना का नेतृत्व भी करा 

1732 में,जोरावरखां नाम के मुगल प्रमुख ने अहमदाबाद पर मार्च किया, शाहू महाराज ने उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए उमाबाई को अहमदाबाद भेजा। मराठी सेना अहमदाबाद पहुंची, यह देखकर कि इस सेना की सेनापति एक महिला थी, जोरावरखां  ने उमाबाई को एक पत्र लिखा,

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आप विधवा हैं, आपके बच्चे हैं, अगर हम आपको ख़तम कर देते हैं, तो आपके बच्चों की देखभाल कौन करेगा ?इसीलिए हमारे रास्ते में मत जाओ, तुम जिस रास्ते से आए हो वहीं लौट जाओ, 

उमाबाई ने फैसला किया कि वह जोरावरखां से लड़ाई जीतकर वापस आएगी, फिर अहमदाबाद के किले के बाहर लड़ाई शुरू हुई,सफेद कपड़े पहने उमाबाई एक विशाल सेना के बीच में युद्ध के मैदान के बीच में एक हाथी पर बैठी थी,उनके पास तरह-तरह के हथियार थे।

उमाबाई ने मावलों की मदद से जोरवरखां की विशाल सेना का सफाया कर दिया,उमाबाई यह रौद्र रूप देखकर जोरावरखां किले के अंदर चला गया और किले के द्वार अंदर से बंद  कर के छुप गया, माबाई ने सोचा कि दरवाजे के अंदर कैसे जाया जाए ? तब दुश्मन की सेना की लाशों के ढेर दरवाजे पर लगे थे 

उमाबाई के सैन्य द्वारा दरवाजा तोड़ दिया और मराठा सेना ने किले में प्रवेश किया,जोरावर खान को पकड़ लिया गया और सतारा लाया गया और उमाबाई सैन्य के साथ तालेगांव लौट आया।

छत्रपति शाहू अहमदाबाद में बहादुरी से खुश थे, महाराज उमाबाई का गुणगान करने के लिए  खुद सामने से तालेगाँव आए, तालेगांव में एक बड़ी अदालत भरी गई थी, छत्रपति शाहू महाराज ने उन्हें सफेद शॉल, सफेद शॉल, दानेदार सोने की प्लेट और विशेष रूप से बनाया का सोने के कंगन से सन्मानित करा 

वह शंकरवाड़ा के पास ओमकारेश्वर में नादगोमोडी में रुकी थी, 28 नवंबर 1753 को इस डेरा में रहते हुए उमाबाई की मृत्यु हो गई, हाल ही में यानी की कल ही उनकी मृत्यु तिथि गयी है, मगर ना तो सरकार ना तो मिडिया द्वारा उनको याद करा गया, ना तो आज तक यह सुवर्ण इतिहास हमारे इतिहासकारो ने हमें पढ़ाया, क्यूंकि वह लोग हमेशा मुग़ल, अंग्रेजो एवं गांधी और नहेरु के चश्मे पहनकर इतिहास लिखा है, जय हिन्द ,

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