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रानी दुर्गावती भारत की एक वीरांगना की सुनहरी गाथा भाग -१

महोबा के चंदेल राजा सालबाहन की पुत्री रानी दुर्गावती भारत की एक वीरांगना थीं, जिनका जन्म 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था, दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया, नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी थी,

RANI DURGAVATI
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रानी दुर्गावती ने पति गौड़ राजा दलपत शाह की असमय मृत्यु हुआ तब दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था, अतः रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया, उन्होंने अनेक मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं, वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था, उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया, रानी दुर्गावती के शासन में राज्य की बहुत उन्नति हुई।

रानी दुर्गावती ने अपने शासन काल में जात-पात से दूर रहकर सभी को समान अधिकार दिए उनके शासन काल में गोंड , राजपूत और कई मुस्लिम सेनापति भी मुख्य पदों पर आसीन थे, रानी दुर्गावती ने वल्लभ सम्प्रदाय के स्वामी विट्ठलनाथ का स्वागत किया, रानी दुर्गावती को उनकी कई विशेषताओं के कारण जाना जाता है वे बहुत सुन्दर होने के सांथ-सांथ बहादुर और योग्य शासिका भी थीं, उन्होंने दुनिया को यह बलताया की दुश्मन की आगे शीश झुकाकर अपमान जनक जीवन जीने से अच्छा मृत्यु को वरन करना है |

दुर्गावती को तीर तथा बंदूक चलाने का अच्छा अभ्यास था, चीते के शिकार में इनकी विशेष रुचि थी, उनके राज्य का नाम गोंडवाना केन्द्र जबलपुर था। 

रानी दुर्गावती राज्य पर मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया, पर हर बार वह पराजित हुआ। मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था। 

उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा, रानी ने यह मांग ठुकरा दी, इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में गोण्डवाना साम्राज्य पर हमला कर दिया। 

युद्ध में एक और जहाँ मुगलों की आधुनिक अस्त्र-शत्र से प्रशिक्षित विशाल सेना थी वहीँ रानी दुर्गावती की  सेना जो छोटी और पुराने परंपरागत हथियार से लड़ने तैयार थी | 

उन्होंने अपनी सेना को नरई नाला घाटी की तरफ कूच करने का आदेश दिया, रानी दुर्गावती के लिये नरई  युद्ध हेतु सुविधाजनक स्थान था क्यूंकि यह स्थान एक ओर से नर्मदा नदी की विशाल जलधारा से और दूसरी तरफ गौर  नदी से घिरा था और नरई के चारो तरफघने जंगलों से घिरी पहडियाँ थीं, मुग़ल सेना के लिये यह क्षेत्र युद्ध हेतु कठिन  था ,  

जैसे ही मुग़ल सेना ने घाटी में प्रवेश किया रानी के सैनिकों ने उस पर धावा बोल दिया, लडाई में रानी की सेना के  फौजदार अर्जुन सिंह मारे गये अब रानी ने स्वयं ही पुरुष वेश धारण कर युद्ध का नेतृत्व किया, शाम होते होते रानी की सेना ने मुग़ल सेना को घाटी से खदेड़ दिया, इस दिन की लड़ाई में रानी दुर्गावती की विजय हुई, रानी रात में ही दुबारा मुग़ल सेना पर हमला करके उसे भरी नुकसान पहुँचाना चाहती थीं परन्तु उनके सलाहकारों ने उन्हें ऐसा नहीं करने की सलाह दी | शायद यही गलती थी 

अपनी हार से तिलमिलाई मुग़ल सेना के सेनापति आसफ खान ने दूसरे दिन विशाल सेना एकत्र की और बड़ी-बड़ी तोपों के सांथ दुबारा रानी पर हमला बोल दिया, रानी दुर्गावती भी अपने प्रिय सफ़ेद हांथी सरमन पर सवार होकर युद्ध मैदान में उतरीं, 

दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया, इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये लेकिन रानी की भी अपार क्षति हुई थी।

अगले दिन 24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला, आज रानी का पक्ष दुर्बल था,रानी के सांथ राजकुमार वीरनारायण भी थे रानी की सेना ने कई बार मुग़ल सेना को पीछे धकेला,कुंवर वीरनारायण के घायल हो जाने से रानी ने उन्हें युद्ध से बाहरसुरक्षित जगह भिजवा दिया, तभी एक तीर रानी दुर्गावती की भुजा में लगा, रानी ने उसे निकाल फेंका, दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया,रानी ने इसे भी निकाला पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया,

रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे, पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ, अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं, महारानी दुर्गावती चंदेल ने अकबर के सेनापति आसफ़ खान से लड़कर अपनी जान गंवाने के कारण इलाहाबाद के मुगल शासक आसफ खान से लोहा लेने के लिये प्रसिद्ध हैं, मृत्यु के पहले पंद्रह वर्षों तक शासन किया था।

क्रमशः पढ़े  अगला भाग >>>>>> रानी दुर्गावती भारत की एक वीरांगना की सुनहरी गाथा भाग - २  

जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जहां गोण्ड जनजाति के लोग जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं, जबलपुर में स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भी इन्ही रानी के नाम पर बनी हुई है।

भारत सरकार ने 24 जून 1988 रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर एक डाक टिकट जारी कर रानी दुर्गावती को याद किया। 

Note- आज लड़किया फ़िल्मी हीरोइनों को फॉलो करती है,उनके रहन सहन और परिधान से आकर्षित होते है,बल्कि वह नहीं सोचते की यह सब नकली लोग है,पैसो के लिए अपने वस्त्र भी हटा देते है अपने शरीर पर से,इसीलिए हर हिंदुस्तानी बहने ऐसी महँ वीरांगनाओ को फॉलो करे जो असल में खूबसूरत होती थी,उनके जीवन से कुछ ना कुछ अच्छा सिखने अवश्य मिलेंगा,


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