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रानी दुर्गावती भारत की एक वीरांगना की सुनहरी गाथा भाग- २

रानी दुर्गावती का नाम भारत की उन महानतम वीरांगनाओं की सबसे अग्रिम पंक्ति में आता है जिन्होंने  मात्रभूमि और अपने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान दिया बारेमे आप पढ़ सकते है रानी दुर्गावती  भारत की एक वीरांगना की सुनहरी गाथा भाग- १ में 

rani durgavati
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शादी के पूर्व रानी दुर्गावती की ताकत का परिचय 

कालिंजर नरेश महाराज श्रीकीर्तिराज शाह शेरशाह सूरी की सेनाओं से भीषण युद्ध करते हुए कई बहुत गहरे घाव खा गए,चंदेल सैनिक उन्हें मूच्छित अवस्था में पालकी में डालकर किसी प्रकार दुर्ग में ले आए, राजकीय चिकित्सक उनकी चिकित्सा में लग गए, समस्त वातावरण में भय व्याप्त था, 

सूरी के सैनिक दुर्ग के सुदृढ़ कपाटों को भग करने का प्रयत्न कर रहे थे,सूरी सैनिकों के शवों और तीखे भालों से बिंधे हुए, करुण चिंगघाड़ों से आकाश को प्रकम्पित करने वाली दहाड़ों से खड़े-खड़े विशाल गजराज दुर्ग द्वार के रक्षक आश्चर्यजनक रूप से बन गए, द्वार से निराश होकर सूरी ने अपनी रणनीति में परिवर्तन कर डाला, दुर्ग के पीछे की दीवार जो अपेक्षाकृत कम ऊंची थी, उसके नीचे लकड़ी का ढालदार प्रशस्त मंच बना कर सूरी के सैनिक बारूद की मोटी तह बिछने लगे, 

अवश्य पढ़े >>>>> >>>>  रानी दुर्गावती भारत की एक वीरांगना की सुनहरी गाथा भाग- १

उधर गढ़ के अंदर नारियों के सम्मान की रक्षा के लिए लकड़ियों के ढेर लगने लगे, दुधमुंहे बच्चों और विशेषकर प्रत्येक आयु की कन्याओं को लेकर उनके चारों ओर नारिएँ एकत्रित होने लगीं, चौराहे-चौराहे पर रखे केसर के घोल में रंग-रौग कर पुरुष केसरिया परिधान धारण करने लगे, किसी भी क्षण बारूद के भीषण विस्फोट से गढ़ की दीवार द्वार का रूप ग्रहण कर सूरी के नृशंस सैनिकों को निबांध प्रवेश का मार्ग प्रदान कर सकती थी। 

पूर्ण श्रृंगार करके महाराज कुमारी दुर्गावती अपनी पाँच-सात समवयस्क सहेलियों के साथ सिंहवाहिनी भवानी की गति से बढ़ती चली आती हैं, वह आदेशात्मक स्वर से बोली “न कोई इन लकड़ियों के पर्वताकार देर में पलीता लगाए और न कोई गढ़ के कपाट खोलकर बाहर निकलने का विचार करे, हम दुर्ग शिखर पर जा रही हैं, स्थिति का आकलन कर शख्ध्वनि पर सभी अपने-अपने आवासों पर लौट जाएँ अन्यथा दुर्ग शिखर से सर्वप्रथम मैं, प्रमुख देर पर क्ट्रेंगी, तब शीघ्रतापूर्वक पलीते लगा दिए जाएँ। 

महाराजा को यद्यपि घाव गंभीर लगे हैं किन्तु वे जीवित हैं,कहती हुई राजकुमारी दुर्गावती अजयगढ़ के प्रमुख शिखर की ओर बढ़ चली, देखा कि बारूद बिछाने का कार्य स्वयं शेरशाह सूरी की निगरानी में विद्युत्गति से हो रहा है, वह सूरी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ताली बजाकर हंस पड़ी शेरशाह सूरी ने जो ही उसकी ओर देखा, वहीं से ऊंचे स्वर से बोली, “शहंशाहे हिंद जनाबे आली महाराजा कुछ ही क्षण के मेहमान हैं, कालिंजर का राजसिंहासन हमारे अधिकार में है, बोलो तुम क्या चाहते हो? मैं तुम्हारा वरण करने को तैयार हूँ, 

इसके अतिरिक्त तुम्हारी कोई शर्त हो, वह लिखकर भेज दो, कालिंजर के साथ अपनी सेना की भी रक्षा करो, उन्हें प्राणदान दो, जब कालिंजर अपनी शासिका सहित तुम्हें अपना शासक स्वीकार करने को तैयार है तो व्यर्थ के खून-खराबे से बचना उचित होगा, अपने वजीर से कही संधि पत्र तैयार करे, अपने सैनिकों से कहो गढ़ का मार्ग साफ करें, ताकि शान से आपकी सवारी गढ़ में तशरीफ ला सके, हम अपने क्रोधित सैनिकों को मुकाबले से आपका संकेत पाते ही तुरंत रोक देंगी।” 

सूरी शाह दुर्गावती के शब्द सुनकर अपने वजीरों से परामर्श करने लगा, किंतु राजकुमारी दुर्गावती से उनका बारूद बिछाने का कार्य गोपनीय रूप से होता हुआ छिपा नहीं रह सका, कालिंजर के सैनिक भी उसी गोपनीय रीति से धीरे-धीरे किंतु तीव्र गति से बारूद को भिगोने लगे, उधर सूरी सैनिक अपने सैनिकों और भालों से बिंधे हुए हाथियों को मोटी-मोटी श्रृंखला डालकर खींचने लगे, इधर कालिंजर के सैनिक पर्याप्त मात्रा में मुख्य द्वार के ऊपर मोटी-मोटी कनातें लगाकर तेल-पानी खौलाने लगे, बड़ी-बड़ी शिलाएँ एकत्रित करने लगे। प्रत्येक बुर्ज पर तीरन्दाजों को ढेरों बाण और पलीते दे-देकर बैठाया जाने लगा। शांतिपूर्वक मुख्य द्वार का मार्ग सूरी सैनिकों ने साफ करके संधिपत्र की स्याही सूखने से पूर्व ज्यों ही आक्रमण किया, 

ऊपर से पहले से भी अधिक शिलाएँ तेल-पानी बरसने लगे, तीखे तीरों ने सूरी सैनिकों के हरावली दस्तों को बांध डाला। सूरी शेरशाह दगा दगा कहते हुए जो ही बारूदी मंच से उतरने लगा, त्यों ही उसके पीछे राजकुमारी दुर्गा और उनकी सखियों के धनुषों से धधकते हुए अग्नि बाण गिरने लगे, बारूद, सौ-सौ लपलपाती जिहवाओं वाला बारूद, गगनचुंबी लपटें लहराने लगा, अपने अंगरक्षकों सहित शहंशाहेहंद जनाबेआला गाजी-काजी जैसी कितनी उपाधिएँ लादे वह लंपट पाजी कोयलों के ढेर का एक कोयला बन कर रह गया, चंदेल सुभटगढ़ का द्वार खोलकर सूरी सैनिकों पर वज़ की भाँत टूट पड़े,  22 मई 1545 को शेरशाह मार दिया गया था।

रानी दुर्गावती  भारत की एक वीरांगना की  सुनहरी गाथा में पढ़ा की शादी के बाद उनके पति की मृत्य हुई,फिर अकबर कि सेना से लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुई,बाद में क्या हुआ वह भी आगे पढ़े 

इसतिहास में वीरंगना रानी दुर्गावती सदा - सदा के लिये अमर हो गई,जिस  दिन रानी ने अपना बलिदान दिया था वह दिन 24 जून 1564 ईसवी था, प्रतिवर्ष 24 जून को बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है और रानी दुर्गावती को याद किया जाता है | 

रानी दुर्गावती के बलिदान के बाद कुंवर वीर नारायण चौरागढ़ में मुगलों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और गोंडवाना पर मुगलों का अधिपत्य हो गया | 

कुछ समय पश्चात  रानी दुर्गावती के देवर और चांदा गढ़ के राजा चन्द्र शाह को अकबर ने अपने अधीन गोंडवाना का राजा घोषित किया और बदले में अकबर ने गोंडवाना के 10 गढ़ लिये |

वर्तमान में जबलपुर जिले में जबलपुर और मंडला रोड पर स्थित  बरेला के पास नारिया नाला वह स्थान है जिधर रानी दुर्गावती  वीरगती को प्राप्त हुईं थीं वहां रानी दुर्गावती का  समाधि स्थल है , प्रतिवर्ष 24 जून को रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर लोग इस स्थान पर उन्हें श्रध्दा सुमन अर्पित करते हैं |

रानी दुर्गावती के सम्मान में 1983 में  जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कर दिया गया |

भारत शासन द्वारा 24 जून 1988 रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर एक डाक टिकट जारी कर रानी दुर्गावती को याद किया |

जबलपुर में स्थित संग्रहालय का नाम भी रानी दुर्गावती  के नाम पर रखा गया |

मंडला जिले के शासकीय महाविद्यालय का नाम भी रानी दुर्गावती के नाम पर ही रखा गया है |

इसी प्रकार कई जिलों में रानी दुर्गावती की प्रतिमाएं लगाई गई हैं और कई शासकीय इमारतों का नाम भी रानी दुर्गावती के नाम पर रखा गया है |

धन्य हैं रानी दुर्गावती जिन्होंने अपने स्वाभिमान और देश की रक्षा के लिये अपना बलिदान दिया, अपने इस लेख के माध्यम से हम रानी दुर्गावती और उनके शाहस और बलिदान को शत-शत नमन करतें हैं | 


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